अज्ञानी

यह लघु कविता कोरोना संक्रमण के दौरान लिखी गयी है। यह उन लोगों की मानसिकता दर्शाता है जिन्हें वास्तविकता एवं दूरदर्शिता से कोई लेना देना नहीं है।

लग रहा है सब मज़ाक़, अभी तो हम हंस रहे है,
लेकिन मौत का शिकंजा खुद पे कस रहे है,
जब लगना चाहिए डर, जब लेनी है सावधानी,
तब कर रहे है हम अपनी मनमानी,
घर पर बैठें कस रहे है उनपर ताना,
भूख-प्यास से जिन्हें है मर जाना,
यह कैसी हमारी ज़िम्मेदारी,
जो कोस रहे उनकी लाचारी,
समझो वो बात जो सबने कही,
मूर्ख कभी बचता नहीं,
जब लगा है काल का दंश,
ना बचा रावण, ना बचा कंस,
अगर समझने में ये देर कर डाली,
ना जलेगा दिया, ना बजेगी थाली |